यह स्वच्छता अभियान कहीं इकनोमिक हिट मैन का कमाल तो नहीं!!!
यह
स्वच्छता अभियान कहीं इकनोमिक हिट मैन का कमाल तो नहीं!!!
गोपा जोशी
जी हां, इकनोमिक हिट मैन(ईएचएम) क्या होता है यह जान पर्किंसं की पुस्तक कंफेशंस आप एन इकनोमिक हिट मैन पढ़ने से पहले मुझे भी मालूम नहीं था। जब किताब पढ़ी तो रोगटे खड़े होगए। ईएचएम का काम कितना खतरनाक है वह इस किताब के छपने में आई कठिनाई से साफ होजाता है।सर्व प्रथम 1982 में इस पुस्तक को छापने की असफल कोशिश की गई। तब इसके शीर्षक की शुरुआत कंसिएंस(conscience
अंतरात्मा) से की गई था।इसके बाद अगले बीस सालों में चार बार यह कोशिश दुहराई गई। हर बार साम, दाम,दंड, भेद, के हथकंडे अपना कर इस पुस्तक का प्रकाशन रुकवा दिया गया। अंत जैसे हमारे यहां बाबरी मस्जिद के विध्वंस के विरोध में कई किताबें लिखी गई उसी प्रकार जान ने 2001 में, सितंबर 11की घटना से त्रस्त होकर यह किताब को छपवाने की ठान ली। इसमें लेखक की बेटी ने हौंसला बढ़ाया और कहा अपने आने वाली पीड़ियों के लिए इस पुस्तक को छापना
अत्यंत आवश्यक था। यदि इस वजह से लेखक की हत्या भी होजाती हो तो वह स्वयं उस अधूरे काम को पूरा करेगी। इस घटना के लिए जान पर्किंस, अमेरिका को जिंमेदार मानता है। अमेरिकी सरकार , बहुराष्ट्रीय सहायता संगठन तथा कारपोरेशंस की मिलीभगत से ही विश्व में ऐसी स्थति पैदा हुई कि सितंबर 11 जैसी घटना हुई। इएचएम के अपने लंबे कार्यकाल में जान ने पूरे विश्व का भ्रमण किया तथा आधुनिक इतिहास की कई ड्रामैटिक घटनाओं --जैसे पनामा के राष्ट्रपति की हत्या, पनामा पर आक्रमण,इरान के शाह का पतन, सउदी अरब का कायाकल्प,इत्यादि इत्यादि
में या तो भागीदारी निभाई या दर्शक रहे। अपने मूल संवैधानिक लक्ष्यों के विपरीत अमेरिका ने वैश्विक साम्राराज्य बनाने की जो साजिश रची है उसको जान समस्त संसार के लिए खतरनाक मानता है अतः इस पुस्तक के माध्यम से उसने इस साजिश का पर्दाफांश करने की कोशिश की।
छपवाने के लिए 2003 में एक शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट प्रकाशन घराने के अध्यक्ष ने इसके प्रारूप को पढ़ा। पुस्तक की सामग्री पसंद करने के बावजूद इसको छापने में असमर्थता व्यक्त की। कारण इसमें जिनकी पोल खोली गई थी उनसे व्यक्तिगत संबंध थे।इसको उपन्यास की शक्ल में छापने की सलाह दी। बाद में एक छोटे प्रकाशन ने इसको छापने का साहस किया।
इएचएम की भूमिका में जान गरीब देशों के राजनीतिज्ञोंको को आधरभूत संरचना के विकास के लिए जरूरत से कई गुना अधिक कर्जा लेने के लिए प्रेरित करता था। एक बार ये देश विदेशी कर्ज के जाल में फस जाते हैं तो अमेरिकी सरकार और इसकी सहयोगी अंतर्राष्ट्रीय सहायता एजंसियां तरह तरह की शर्तें लगाकर उनका तेल व अंय संसाधनों का उपयोग अपने वैश्विक साम्राराज्य बनाने में करते हैं। यह काम अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय साजिश तथा भ्रष्टाचार के माध्यम से करता है।
लेखक बताता है कि ये ईएचएम मोटा वेतन पाने वाले विशेषज्ञ होते हैं जो हर साल विश्व भर के देशों को लाखों करोड़ डालर का चूना लगाते हैं। वे विश्व बैंक, अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (यू. एस. एड.), और अन्य विदेशी सहायता संस्थाओं के सहयोग से पूंजी का प्रवाह विशाल निगमों, तथा कुछ ऐसे रईस परिवारों जिनका विश्व के प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रण है की तिजोरियों की ओर करते हैं। यह काम झूठी वित्तीय रपटें बनाकर,फर्जी मतदान करा कर, घूसखोरी, जुआ, शराब व शबाब की संस्कृति विकसित कर, जबरन उगाही,तथा हत्या आदि करवा कर किये जाते रहे हैं। लेखक का कहना है कि इक्वाडोर के राष्ट्रपति जाइमे रोलडौस(Jaime Roldos), तथा पनामा के राष्ट्रपति ओमर तोर्रिजोस(Omar Torrijos), की मौतें दुर्घटनाएं नहीं थी। उनकी हत्या कारपोरेट जगत, सरकार व बैंको के गठजोड़ का विरोध करने की वजह से हुई थी। ईएचएम इनको रास्ते पर लाने में सफल नहीं हुए तो सीआइए के गीदड़ों जो ईएचएम के पीछे हमेशा तैयार खड़े रहते हैं ने अपना खेल कर दिया।
लेखक को क्लौडाइन (Claudine) नामक महिला शिक्षक ने ईएचएम के खांचे में ढ़ाला। तभी उसने साफ कर दिया था कि एक बार ईएचएम बनने का मतलब सारी जिंदगी ईएचएम बने रहना। ईएचएम का काम पूरे विश्व के राष्ट्रों के राजनीतिज्ञों को अमेरिका के व्यापारिक हितों के अनुरूप ढ़ालना था। अमेरिका अपनी राजनीतिक, आर्थिक, सैनिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इन राजनीतिज्ञों की सेवाएं लेता है बदले में ये नेता अपने देशों में अमेरिकी पूंजी से औद्योगिक पार्क, बिद्युत संयंत्र, हवाई अड्डे आदि बना कर राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करते हैं।इस प्रक्रिया में अमेरिका की इंजीनियरिंग, निर्माण जैसी कंपनियों की तिजोरियां भर जाती हैं।जान पर्किंग ने लिखा है कि इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप आज बड़े बड़े कारपोरेट तीसरी दुनियां के देशों के लोगों को अमानवीय असुरक्षित परिस्थितियों में नाम मात्र की मजदूरी में लंबे समय तक काम करने को मजबूर करते हैं। तेल कंपनियां वनों, नदियों को टोक्सीन से प्रदूषित कर रही हैं। जिससे सृष्टि के अस्तित्व को खतरा पैदा होगया है। दवा कंपनिया लोगों को जीवन रक्षक दवाओं से वंचित रख रही हैं।
ईएचएम द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी परिस्थितियों की उपज है। 1951 में इरान की जनता ने ब्रिटिश तेल कंपनी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था।इस विद्रोह को ठंडा करने के लिए इरान के तत्कालीन लोकप्रिय प्रधान मंत्री ने इरान की सारी पेट्रोल संपदा का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे इग्लेंड के हितों को चोट पहुंची। इग्लेंड ने अमेरिका से मदद की गुहार की। अमेरिका ने सीआइए एजंट करमिट रूजवैल्ट (Kermit Roosevelt )को इरान भेजा। उसने साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर वहां पर दंगे प्रायोजित ।करवाए इरान के प्रधान मंत्री के खिलाफ हिंसक आंदोलन आयोजित करवाए।इरान के लोकप्रिय प्रधान मंत्री को अपदस्त कराकर कैद में डाल दिया गया। अमेरिकी समर्थक तानाशाह शाह को गद्दी पर बैठाया
गया। इस प्रकार इस नए धंधे की शुरुआत हुई।1960 के दशक में बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मद्रा कोष जैसे बहुराष्ट्रीय संगठनों का सशक्तीकरण हुआ। चूंकि विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मद्रा कोष में पूंजी अमेरिका तथा मित्र यूरोपीय देशों से आती थी इस सशक्तीकरण से इन देशों की सरकारों, कारपोरेट जगत और विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बहुराष्ट्रीय संगठनों के बीच आपसी निर्भरता बढ़ी। लेखक के इएचएम बनने तक इएचएम व्यवस्था का प्रशासनिक ढ़ाचा तथा ताना बाना पूरी तरह परिष्कृत होगया था। अब अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं जिनमें नासा भी शामिल था केवल इएचएम की जिंमेदारी निभाने के काबिल उमीदवारों का चयन करते थे।इनकी सेवाएं बहुराष्ट्रीय कंपनियां लेती थी और वही इनके वेतन का भुगतान करती थी। इससे यदि इनकी काली करतूतों की पोल खुल भी जाती तो सरकार पर आंच नहीं आती थी। हालांकि कारपोरेशन सरकार के पैसे से ही इनके वेतन आदि का भुगतान करती थी परंतु यह वित्तीय लेनदेन काग्रेस के नियंत्रण क्षेत्र से बाहर होता है। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ट्रेड मार्क, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, तथा सूचना की स्वतंत्रता जैसे कानूनों का संरक्षण भी मिलने लगा।
स्वच्छता अभियान की मशाल किस प्रकार विदेशी पूंजी से जल सकती है और कैसे इसके आलोक में सब कुछ देशीय स्वाहा हो जाता है यह भी लेखक ने अपने प्रयोग के माध्यम से बताया है। यह प्रयोग लेखक ने सर्व प्रथम सउदी अरब में किया। इसका विस्तित वर्णन पुस्तक के 15वे अध्याय में किया गया है। मोदी के इस स्वच्छता अभियान पर शक इसलिए भी होता है कि मोदी, मोदी की पार्टी तथा पैतृक संस्था कभी गांधी के समर्थक नहीं रहे। मोदी के गुजरात माडल में स्वच्छता कभी महत्वपूर्ण नहीं रही।इसका बीभत्स नजारा चीनी राष्ट्रपति की गुजरात यात्रा के दौरान तब दिखा जब राष्ट्रपति के रास्ते में पड़ने वाली झुग्गियों को ढ़क दिया गया।(ढ़कने के बजाय उनकी साफ सफाई की जा सकती थी रख रखाव सुधारा जा सकता था। पर गरीब झुग्गीवासियों की ऐसी किस्मत कहां)!!!
इस पुस्तक के 15वे अध्याय में सउदी अरब के धन शोधन के मामलों का वर्णन करते हुए जान पर्किंग लिखता है कि 6 अक्तूबर 1973 के मिस्र और सीरिया के इजराइल पर आक्र्मण से तेल संकट (oil crisis ) की शुरुआत हुई। मिस्र के राष्ट्रपति सादात ने सउदी अरब के शासक पर दबाव डाला कि वह तेल को हथियार बनाकर अमेरिका पर इजराइल का साथ नहीं देने का दबाव बनाए। 16 अक्तूबर को खाड़ी के सात देशों ने तेल के दामों में 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी। 17 अक्तूबर को सीमित तेल प्रतिबंध का ऐलान हुआ। यह तेल प्रतिबंध 18 मार्च 1974 तक चला। परंतु इसने अमेरिका को हिला दिया। इस आघात ने कारपोरेट जगत, अंतरराष्ट्रीय बैंकों, और सरकार को और करीब ला दिया। नीति निर्धारण के स्तर पर भविष्य में इस प्रकार को आघातों की संभावना को ही समाप्त करने के लिए रणनीति की आवश्यकता पर बल दिया गया।पैट्रोडालर की आमदनी से सउदी अरब में उपभोक्ता संस्कृति पनपी। वहां के लोग पश्चिमी देशों के रहन सहन को अपनाने लगे। इस प्रकार सामाजिक रूप से भी सउदी अरब अमेरिकी खांचे में ढ़लने को तैयार हो गया।इस घटना के बाद विश्व राजनीति में सउदी अरब की स्थिति अधिक महत्वपूर्ण होगई। तेल प्रतिबंध लगाकर कमाए गए सउदी अरब के पैट्रोडालरों को अमेरिका वापस लाने के रास्ते खोजे जाने लगे। साथ ही सउदी अरब सरकार को बदले परिवेश के अनुरूप अपने लिये संस्थांए और प्रशासनिक ढ़ाचा खड़ा करने में मदद करने पर जोर दिया जाने लगा। अतःतेल प्रतिबंध समाप्त होते ही अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज कर दी। एक संयुक्त अमेरिका सउदी अरब आर्थिक सहयोग आयोग का गठन हुआ। इसको JECOR के नाम से जाना जाता है। JECOR समझौता बहुत महत्वपूर्ण था। इससे अमेरिका की सउदी अरब में पैठ बहुत गहरी होगई तथा आपसी निर्भरता इस तरह बढ़ गई कि सउदी अरब का अमेरिका के चुंगल से निकलना संभव नहीं रह गया।
पारंपरिक सहायता कार्यक्रमों के विपरीत इस आयोग की जिमेंदारी सउदी अरब के पेट्रोडालरों के बदले में अमेरिकी कंपनियों की सोवाएं सउदी अरब के आधुनिकीकरण के लिये मुहैया कराने की थी। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग को इस आयोग के वित्तीय व प्रबंधन की सारी जिंमेदारी सोंप दी गई। चूंकि सउदी अरब के पेट्रोडालर खर्च हो रहे थे अमेरिका के नहीं इसलिए इस आयोग की गतिविधियां कांग्रेस के दायरे से बाहर थी। इस परियोजना पर अमल करने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने सलाहकारों टीम की एक टीम बनाई उसका एक सदस्य जान पर्किंसं भी था। इस टीम के सदस्यों के काम में अत्यधिक गोपनीयता बरती गई।एक सदस्य को दूसरे के कामों के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। जान पर्किंसं की जिमेंदारी थी कि अमेरिकी इंजीनियरिंग व निर्माण कंपनियों के लिए सउदी अरब में ज्यादा से ज्यादा काम के अवसर पैदा करे। जान पर्किंसं को बताया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा तथा धन अर्जन की दृष्टि से यह मिशन बहुत महत्वपूर्ण था। लेखक का मुख्य काम ऐसे प्रोजक्ट बनाना था जिनकी सहायता से सउदी अरब की अर्थव्यवस्था का ताना बाना अमेरिकी अर्थव्यवस्था से इस प्रकार गुथ जाय कि भविष्य में अमेरिका की नीतियों का समर्थन करना उसकी मजबूरी होजाय।
1974 में सउदी अरब के एक कूटनितिज्ञ ने अपने देश की राजधानी रियाध की कुछ फोटो जान पर्किसं को दिखाई। इनमें से एक फोटो में सरकारी दफ्तरों के बाहर कूड़े के ढ़ेरों को खाकर साफ करती हुई बकरियों के झुंड का था। कूटनितिज्ञ ने जान पर्किंसं को बताया कि आम सउदी अरब का वासी कबाड़ का निपटान करना अपने आत्मसंमान के विरुद्ध मानता था। अतः बकरियां ही खाकर कूड़े को ठिकाने लगाती थी। बस जान पर्किंसं को सउदी अरब में पूंजी निवेश करने का रास्ता मिल गया। लेखक ने कूड़ा निपटान के लिए बकरियों के स्थान पर आधुनिकतम कूड़ा संग्रह और निपटान प्रणाली का निर्माण, बड़े पेट्रोकेमिकल परिसरों की स्थापना और उनके आसपास विशाल औद्योगिक पार्कों का विकास के प्रस्ताव दिया साथ में इनके बन जाने से नए हवाई अड्डों, बंदरगाहों के निर्माण की आवश्यकता, हजारों मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता वाले उपक्रमों,तथा बिजली संचरण और वितरण लाइनों, राजमार्गों, पाइपलाइनों, संचार नेटवर्क, और परिवहन प्रणालियों की बढ़ती मांग की फेहरिस्त तैयार की। इसके अलावा सेवा उद्योगों को लगाने के साथ साथ इस व्यवस्था को चलाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के निर्माण का खाका भी तैयार किया गया।
इस प्रकार सफाई तंत्र के विकास से प्रारंभ हुआ यह प्रस्ताव एक मॉडल प्रस्ताव बन गया। चूंकि सउदी लोग शारीरिक श्रम को हीन समझते हैं इसलिए आधुनिकीकरण की इन सभी परियोजनाओं के निर्माण के लिए मानव संसाधन बाहर से आना था। इस आयातित संसाधन के रहने के लिए विशाल आवासीय परिसरों, शॉपिंग मॉल, हस्पतालों, पानी, मलजल उपचार संयंत्र अग्निशमन,पुलिस विभाग , बिजली, संचार, और परिवहन नेटवर्क का निर्माण से पैट्रोडालर कमाने की संभावनाएं और भी अपार होगई। इस प्रकार इएचएम की भूमिका में नए आयाम जुड़ गए। अब सउदी अरब को कर्ज के बोझ तले इस प्रकार दबाना नही था, ताकि वह उऋण न हो सके। वरन उसके सामने विकास का ऐसा ढ़ाचा खीचना था कि वह उसमें डूबता चला जाय। इसके बदले में अमेरिका ने पेट्रोडालर भी हथिया लिए। साथ ही भविष्य में तेल पर प्रतिबंध नहीं लगाने का आश्वासन भी सउदी अरब से ले लिया। इस प्रकार इएचएम की भूमिका में नए आयाम जुड़ गए।
एक बार प्रस्ताव बनाने शुरु किये तो बनते चले गए। बकरियों के स्थान पर आधुनिक संयंत्र लगाने की योजना के साथ साथ निर्यात के लिए कच्चे तेल से तैयार माल बनाने के संयंत्र, बड़े बड़े औद्योगिक पार्क,बिजली उत्पादन सड़क निर्माण,संचार माध्यमों का विकास, गैस पाइप लाइन डालना, आदि आदि।इस माडल के अंय देशों में भी अपनाए जाने की संभावनाएँ भी अपार थी।पैट्रो डालर के अभाव में गरीब देश विश्व बैंक से कर्जा ले सकते थे। इन परियोजनाओं का बजट हमेशा अनुमानित होता था। मुख्य उद्देश्य अमेरिकी कंपनियों को अधिकतम् लाभ पहुंचाना तथा सउदी अरब की अमेरिका पर निर्भरता बढ़ाना था। ये दोनों उद्देश्य बड़ी सहजता से साथ साथ प्राप्त किये जा सकते थे। कारण यहां लगाई जाने वाली परियोजनाओं की तकनीक इतनी परिष्कृत थी कि इनको समय समय पर और परिष्कृत करने तथा सर्विसिंग की आवश्यकता पड़नी थी। अतः सउदी अरब लंबे समय के लिए अमेरिकी कंपनियों पर अपनी परियोजनाओं के रख रखाव के लिए निर्भर हो गया। अगले कई दशकों तक अमेरिका की झोली पैट्रो डालर से भरनी थी। आधुनिकीकरण के इस प्रोग्राम से देश के भीतर का पारंपरिक संतुलन तथा इस क्षेत्र के देशों के बीच का संतुलन गड़बड़ा गया। देश के भीतर पश्चिमीकरण की इस बयार का विरोध करने वालों को दबाने के लिए तथा विदेशी आक्रमण के खतरे से इन संयत्रों को बचाने के लिए अमेरिकी हथियारों की आवश्यकता, और इन आधुनिक हथियारों के समय समय पर परिष्करण तथा रख रखाव के लिए लंबे समय तक इन कंपनियों पर निर्भरता पड़नी थी। हथियारों के रख रखाव के लिए भवनों आदि का निर्माण, सुरक्षाकर्मियों के लिए भवन व अंय सुविधाओं का निर्माण के साथ साथ सुरक्षा के लिए हवाई अड्डे आदि के निर्माण कार्यों में अमेरिकी कंपनियों की चांदी होनी थी। इस प्रकार सउदी अरब एक ऐसी गाय होगया जिसको अपने रिटायर होने तक ये इएचएम दुह सकते थे। चूंकि सभी इस बहती गंगा में हाथ धोने के लिए उतावले थे, अतः इस तथाकथित शोध और विकास कार्य के लिए राशि कई कंपनियां दे रही थी।
अमेरिका ने सउदी अरब के तेल के दाम बढ़ाने की स्वतंत्रता पर भी लगाम लगा दी साथ ही यदि अंय तेल उत्पादक देश अमेरिका और यूरोप के देशों को तेल बेचने पर प्रतिबंध लगाते हैं तो सउदी अरब अपने तेल भंडारों से अधिक तेल निकाल कर इसकी भरपाई करेगा यह आश्वासन भी ले लिया था। इसके बदले में अमेरिका ने यहां के राजघराने को किसी भी खतरे के विरुद्ध राजनीतिक तथा सैन्य सुरक्षा का भरोसा दिया। इस प्रकार यह घराना अमेरिका की मदद से लंबे समय तक राज कर सकेगा। अब इस राजघराने को पड़ोसी देश— इरान,इराक, सीरिया, इजराइल से सुरक्षा का आश्वासन मिल गया। इसके अलावा सउदी अरब को पेट्रोडालर से अमेरिकी सरकार की प्रतिभूतियां को खरीदना था।इन प्रतिभूतियों से अर्जित ब्याज से अमेरिका को सउदी अरब का आधुनिकीकरण करना था। यह अपने आप में एक अभूतपूर्व साजिश थी। सउदी अरब के पैट्रोडालरों का उपयोग कर इएचएम को इस देश (सउदी अरब) को अमेरिकी व्यापारिक घरानों के हितों के अनुरूप ढ़ालना था। अमेरिका में इन व्यापारिक घरानों की ये गतिविधियां काग्रेस के निरिक्षण क्षेत्र से बाहर थी। इस प्रकार बड़ी चालाकी से सउदी पूंजी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में झोंक दी गई।
लेकिन सउदी राज घराने के राजकुमार को इस पूरे सौदे में साजिश नजर आई। इसको पटाने के लिए जान पर्किंसं ने सुंदरी के लिए इसकी कमजोरी खोज निकाली। इसकी मांग के अनुरूप इसके लिए अमेरिका यात्रा के दौरान साथ रहने, बाद में सउदी अरब में इसकी रखैल बनने को तैयार सुंदरियों की मदद से इस समझौंते को अंजाम दिया गया।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के समय यह पुस्तक इसलिए प्रासंगिक होगई है कि एक तो यह यात्रा बहुत सुनियोजित थी। अमेरिका जाने से पहले अच्छे दिन लाने का, महंगाई कम करने आदि वादों के विपरीत नया नारा स्वच्छ भारत प्रचारित किया गया। सारा सरकारी तंत्र इसमें झोंक दिया गया। स्वंय मोदी ने 2 अक्तूबर को इस देशव्यापी अभियान का शुभारंभ करने का एलान किया।अमेरिका ने भी इस स्वच्छता अभियान को हाथों हाथ लिया। ऐसा लगा कि ओबामा सरकार मोदी के सपनों का भारत बनाने के लिए तत्पर बैठी है। ओबामा ने झट से इस सफाई अभियान में सहयोग करने का वादा कर दिया।साथ ही तीन शहरों को स्मार्ट शहर बनाने का बचन भी दे दिया।इससे पहले जापान के क्योटो शहर ने वारानसी के आधुनिकीकरण का वादा किया।मीडिया के एक बड़े हिस्से. राजनीतिक दलों व विशेषज्ञों ने इन वादों का खुले दिल से स्वागत किया। क्या हम उंमीद करें कि इन वादों के पीछे कोई हिट मैन नहीं है।
अमेरिका और मोदी की आतंकवाद के विरुद्ध संयुक्त मुहिम चलाने पर सहमति
को भी बहुत प्रचारित किया जारहा है। लेकिन आतंकवाद का जनक कौन है। 2004, 2005, में
पंग्विन अमेरिका ने स्टीव कौल की घोस्ट वार शीर्षक से करीब 800 पेज की
पुस्तक छापी। स्टीव कौल ने 1989-92 बीच में वाशिंगटन पोस्ट के साउथ एशिया ब्यूरो
के मुखिया के तौर पर अफगानिस्तान मामलों पर रिपोर्टिंग की। 1998 से वाशिंगटन पोस्ट
के प्रबंधक संपादक रहे। 1990 के एक्सप्लेनेटरी जर्नेंलिज्म में पुटलिजर अवार्ड
विजेता रहे हैं। सितंबर 11, 2001 की घटना के बाद स्टीव कौल ने भी घोस्ट वार पुस्तक
में इस घटना के कारणों की पड़ताल की और आतंकवाद बढ़ाने खास कर हमारे पड़ोसी देश
में इसकी गहरी पैठ बनाने में अमेरिका तथा सीआइए की भूमिका को विस्तार में उजागर
किया। इएचएम जान पर्किंस ने लिखा है कि अमेरिका ने सउदी राज परिवार को ओसामा बिन
लादेन को सोवियत यूनियन के विरुद्ध जिहाद चलाने के लिए खजाना खोलने के लिए प्रेरित
किया। अमेरिका तथा रियाध ने संयुक्त रूप से इस मुहिम के लिए 3.5 बिलियन डालर
झौंके। सउदी अरब के धन से 20 देशों में जिहादी गुटों को प्रशिक्षित किया जारहा था।
लेखक कहता है कि सउदी राजपरिवार तथा भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश परिवार के
बीच 1974 से ही राजनीतिक, आर्थिक तथा व्यक्तिगत स्तर पर मधुर संबंध रहे हैं।
सितंबर 11 की घटना के बाद धनी सउदी परिवारों जिनमें ओसामा बिन लादेन का परिवार भी
था को गुप्तरूप से निजी जैट विमानों से अमेरिका से भागने में किसने मदद की यह आज
तक मालूम नहीं है। कोई सरकारी अफसर यह बताने तैयार नहीं थी कि किस ने यात्रियों के औपचारिक जांच की।
जान का मानना है कि यह इन दो परिवारों(बुश और सउदी राजघराने) के मधुर संबंधों की
बदौलत संभव हुआ। विक्की लीक तथा स्नोडन के खुलासों से साफ होजाता है कि अमेरिका ने
2001 की घटना से कोई सबक नही लिया है। ऐसे में भारत किस आधार पर विश्वास कर सकता
है कि अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध मुहिम चलाने का वादा निभाने में इमानदारी
बरतेगा।

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